अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः॥
अर्थात – सभी जीवों के प्रति कर्म, मन, एवं वाणी द्वारा अद्वेष, दया, और दानशीलता ही सनातन धर्म है
महाभारत :वनपर्व 297 : 35
(Bhandarkar Oriental Research Institute BORI) – (महाभारत :वनपर्व 281: 34)
सनातन को माने ही नहीं,
जाने भी।
हमारा उद्देश्य मानव मात्र को इस भू लोक के सबसे बहुमूल्य रत्न सनातन धर्म के मूल स्वरूप से अवगत कराना तथा इससे जुड़ी भ्रांतियों का निवारण करना है।
एक दृष्टी सनातन धर्म के सूत्रधारों और उनके संकलन व् रचनाओं पर
मानव जीवन की
सम्पूर्णता का प्रयास
84 लाख योनियों में सर्व श्रेष्ठ, मानव शरीर;
तीन शक्तियों ज्ञान-शक्ति, इच्छा-शक्ति और क्रिया-शक्ति ये युक्त;
त्रिवर्ग पुरुषार्थ धर्म (मार्ग), अर्थ (कर्म) और काम (फल की इच्छा) में सक्षम;
इस जीवन उत्सव को आनंद और सम्पूर्णता से जीकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने हेतु प्राप्त हुआ है।
सनातन संस्था का उद्देश्य, जुड़े सभी सदस्यों को इन सभी क्षेत्रों में सम्पूर्णता प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना है।

डॉ. सच्चिदानंद शर्मा
संयोजक एवं प्रेरणा स्रोत श्री सनातन संसथान व श्री माधाव भागवत सेवा धाम (रजि.) उज्जैन, मध्य प्रदेश













